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kuch ansulzhe sawal
गर होती है हर बात खुदा की मर्ज़ी से, तो इंसान के कर्मो का हिसाब वो रखता क्यूँ है.....
सूख जाना ही है उसको इक रोज़, तो पत्ता डाली पर पनपता क्यूँ है....
डरता है बदनामी से इस कदर, तो यह दिल प्यार करता क्यूँ है....
जलना ही है मुक्कदर उसका, तो मोम पानी सा पिंगलता क्यूँ है...
फ़ना करना ही है मोहब्बत का मकसद, तो जिस्म उसमे निखरता क्यूँ है.....
मिट जाना ही है एक दिन, तो यह जिस्म जनम लेता क्यूँ है...
इंसानियत ही है मजहब सबका, तो कोई दबता तो कोई जलता क्यूँ है...
ऋतुसरोहा
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