हम कभी ना समझ पाए के ,
क्यों बरसता है आसमाँ गरज गरज कर ....
क्या यह बूंदे आंसू है उसके
या भिगोता है वोह हमें खुश हो कर....
कभी लगता है के
वोह रो पड़ा है ,मेरे दर्द पर ,
और कभी लगता है के वोह हँस पड़ा है ,
मुझे खिलखिलाता देख कर ...
कभी लगता है के वोह बरसता है बुझाने को धरती कि प्यास ,
और कभी लगता है के वोह करता है ग़ुस्सा गरज गरज कर ...
काश होता उसके इजहार का तरीका अलग,,
हम भी समझ पाते कब वोह हँसता है कब वोह रोता है ........